कल्पना

  • हर ख्याल मृत्यु का ही ख्याल है।”

 

  • “‘कोई’- भ्रम, छल और हमारी कल्पना है।”

 

  • तुम जिसको कहते हो कि जानते हो, तुम उसको नहीं जानते| सिर्फ़ जानने के गहरे भ्रम में रहते हो |”

 

  • जो विस्तृत है, वही तो धोखा है। जो अलग-अलग है, वही भ्रम है।”

 

  • “कल्पनाएँ ही आलस्य हैं”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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