कर्तव्य

  • कर्तव्य जब समझ से प्रस्फुटित होता है, तो धर्म कहलाता है।”

 

  • कर्तव्य नहीं रहता तो नफ़रत नहीं रहती।”

 

  • यदि कर्तव्य वास्तव में विदा हुआ है तो प्रेम आएगा।”

 

  • “कर्तव्य हमेशा सीमित होता है।प्रेम असीमित होता है।”

 

  • “कर्तव्य तो होता ही सिर्फ उनके लिए है, जिन्हें उनके धर्म का पता नहीं। जिन्हें अपना पता है, वह धर्म पर चलते हैं, कर्तव्य पर नहीं चलते।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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