कबीर

  • कबीर से कुछ माँगना ही मत, कबीर के अलावा। तुमसे अब हम कम कुछ माँगेगे ही नहीं। कम माँगना, माँगने का अपमान होगा।”

 

  • सत्य प्रेम है, प्रेमपत्र नहीं। अपनी साखियों के माध्यम से तुम्हें जहाँ को बुला रहे हैं कबीर, वहाँ को जाओ। साखी पकड़कर मत बैठ जाओ।”

 

  • कबीर, कबीर के अलावा कुछ नहीं कहते। कबीर होना माने साक्षी होना। तुम भी साक्षी हो जाओ।”

 

  • हरिजन का हारना हार नहीं, हार का अतिक्रमण है। जीत-हार के चक्र से मुक्त हो जाना है। वही कबीर का ‘हारा’ है। कबीर का हारा वो नहीं जो जीत नहीं पाया, कबीर का हारा वो है जो जीत से आगे निकल गया।”

 

  • सांसारिक मन सत्य को भी अपने तल पर गिरा लेता है। संसार तो कबीर को भी साहित्य से जोड़ देता है।”

 

  • आजा से आशय है मूल, मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो कबीर का ‘बिंदु’ है।”
  • “कबीर की दासत समर्पण है ।”
  • “कबीर यदि उदास होते हैं, तो हमारे लिए होते हैं। और हम जब उदास होते हैं। तो अपने लिए होते हैं।”

  •  कबीर वो, जो मन पर नहीं चलता। कबीर वो जो विचार पर नहीं चलता।”

 

  • “कबीर का राम तो लगातार कबीर के साथ है।”

 

  • “आप कबीर को नहीं याद करते, आप कबीर के माध्यम से अपने आप को याद करते हो।”

 

  • “अगर बच्चे की ज़िन्दगी में बचपन से ही कबीर नहीं हैं तो वो बच्चा आतंरिक रूप से बहुत मरियल निकलेगा, कोई दम नही होगा उसमे, ज़िन्दगी के आघात नहीं सह पाएगा|”

 

  • “जिस घर में कबीर के दोहे न गाए जाते हों उस घर में गड़बड़ होना सुनिश्चित है |”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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