एक

  • उस तक जाने का रास्ता मात्र वही बता सकता है। “सिखाने वाला एक है, माध्यम हज़ार।”

 

  • एक ठीक रखो, सब ठीक रहेगा।”

 

  • महत्वपूर्ण है महत्वपूर्ण को याद रखना।”

 

  • जो खोजता है उसे कुछ मिल नहीं जाता। वहाँ जो मिलता है वो इतना विराट है कि तुम उसमें समा जाते हो। वो कोई छोटी चीज़ नहीं कि उसे जेब में रख लिया।”

 

  • जो है, वो है ही। कुछ उसे बदल नहीं सकता। जो नित्य है, वो सत्य है। सत्य नाश्वान और परिवर्तनशील नहीं है।”

 

  • भक्ति का अर्थ है अहंकार से मुक्त होकर अपने से विराट को मान्यता देना और जानना कि वो असली है और मैं नकली हूँ।”

 

  • आजा से आशय है मूल, मूल सत्य। वो मौन है, वो अनस्तित्व है, वो कबीर का ‘बिंदु’ है।”

 

  • हरि निर्विशेष है। वो विशिष्ट नहीं।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • मुफ़्त मिलेगा, बस पकड़ना मत। वो इसी शर्त पर मिलता है कि पकड़ना मत।”

 

  • समर्पण का अर्थ है असीम बल। तुम अपने आप को जो मानते हो वही तुम्हारी कमज़ोरी है। अपनी कमज़ोरी का समर्पण कर दो। प्रार्थना करो और प्रतीक्षा करो कि वो पुकारे। उसकी पुकार ही तुम्हारा आत्मबल बनेगी। और तुम भागे चले जाओगे, अपना सारा कचड़ा पीछे छोड़ कर, यही समर्पण है।”

 

  • वो बहुरूपिया है। वो सारे रूप रखता है पर उसका कोई रूप नहीं है।”

 

  • वो तुमसे इतना दूर है कि उसे छू पाओगे। वो तुमसे इतना करीब है कि उसे छू पाओगे।”

 

  • आप संत को उन तरीकों से संत जानते हो जिन तरीकों से समाज ने आपको समझा दिया है। यह समाज की चाल है ताकि आप असली तक जा पाओ। असली तो बुलाता है। वो लगातार बुलाता है।”

 

  • जो तुममें विराट और महान है, वो तुम्हारा हिस्सा नहीं, तुम्हारी बुनियाद है।”

 

  • जब तक खुद को उससे अलग और उससे दूर जानोगे, उससे अलगाव बना रहेगा।”

 

  • परमात्मा तुम्हारे भीतर नहीं, तुम परमात्मा के भीतर हो।”

 

  • जो ऊँचे से ऊँचा लक्ष्य है वो तुम्हारे भीतर है और उसे पाया ही जा चुका है। मन तब धीर है, शांत है।”

 

  • तुम मुझे बिल्कुल जान पाओगे, और मैं तुम्हारी नस-नस से वाकिफ़ हूँ।”

 

  • सिखाने वाला एक है, माध्यम हज़ार।”

 

  • उस तक जाने का रास्ता वही दिखाए।”

 

  • पहला याद रखो, आखिरी स्वयं हो जाएगा।”

 

  • “जो असली है वो तुम्हें मन के माध्यम से नहीं मिलेगा।”

 

  • “जिस एक की सत्ता है, जो एक सत्ता है, सो प्रभु।

  • “अन्तर्यामी शब्द बड़ा कीमती है। अन्तर्यामी शब्द का यह अर्थ नहीं होता कि जो सर्वत्र है, अन्तर्यामी शब्द का अर्थ होता है कि जो रेशे-रेशे में समाया हुआ है और आगे कहें तो जो स्वयं रेशा-रेशा है। जो स्वयं रेशा-रेशा है उसको कहते हैं, अन्तर्यामी।”

 

  • “शिव ही संसार हैं।

 

  • “जिसके वजूद से सबका वजूद है, उसको पहचानो।”

 

  •  सब कुछ उसमें है लेकिन उसे कोई सरोकार नहीं है अपनी मौजूदगी का एहसास कराने में।”

 

  • “तुम उसके साथ रहो जिसका जीतना पक्का है।”

 

  • “उसी की पुकार है जो तुम्हें उस की और खींचती है। वही है जो अपनी ओर की यात्रा शुरू कराता है और वही है जो स्वयम यात्रा के अंत पर खड़ा है।

 

  • “जब तक इस भाव में स्थापित नहीं हो जाते कि चारों दिशा जो है, सो एक स्रोत का प्रकाश है, दिखभर अलगअलग रहा है, तब तक बिमारी बनी ही रहेगी।”

 

  • “जो परम को भुला कर संसार की ओर जायेगा, वो संसार में मात्र चोट खायेगा। जो संसार को भूल कर, परम की ओर जायेगा, वो परम को तो पायेगा ही, संसार को भी पा जायेगा।”

 

  • “जिसने विराट को देख लिया हो और उसका सामीप्य पा लिया हो, वह छोटे से डरना छोड़ देता है।”

 

  • “अंदर-बाहर एक है! जब बाहर से निकालो, तो सिर्फ़ बाहर का मत निकाल दो, भीतर से भी निकल जाने दो।”

 

  • “जो भीतर से एक है, उसे बाहर भी एक ही दिखाई देता है।”

 

  •  “बाहर एक दिखाई पड़ रहा है इसका मतलब यही है कि बाहर कुछ भी दिखाई पड़ रहा है, भीतर एक ही बना हुआ है।”

 

  • “बहुत साधारण सी बात है ये, कि उसी में सब कुछ है, और उसके बाहर कुछ नहीं है। जो इस बात को बूझ जाए, वो सब कुछ जान गया।”

 

  • “गेंदे के फूल का और गुलाब के फूल का तत्व एक ही है, पर वो प्रकट अलग-अलग रूप से हो रहा है।”

 

  • जो बाहर वाला है, वो बस भीतर वाले का एक बिंब है। भीतर वाला ही साकार हो कर, बाहर वाला बन जाता है।”

 

  • “ओट तो एक की ही होती है, उसके अलावा जिसकी भी मैंने ओट ले रखी है, निराशा ही मिलेगी।”

 

  • “जप का यह अर्थ नहीं है कि एक ही नाम लियाजप का अर्थ यह है कि जो भी नाम लिया उसके पीछे गूँज एक ही नाम की थी।

 

  • “हर नाम में एक ही नाम की सुरति बनी रहे, यही तो जप है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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