उम्मीद

  • सुख की उम्मीद का दूसरा नाम है, दुःख।”

 

  • असुरक्षा के भाव से किये गए हर कर्म से हम ये उम्मीद करते हैं कि उससे सुरक्षा मिल जायेगी। बिना डर के तो हमें साँस लेना भी नहीं आता।”

 

  • बेचैनी आशा रूप में: कुछ मिल जाएगा। बेचैनी ममता रूप में: कुछ छूट जाए। आशा और ममता तब उठते हैं जब आप सत्य से दूर होते हैं।”

 

  • आशा बचाती है अतीत के कचरे को।”

 

  • “जहाँ उम्मीद है वहीँ दुःख है। “

 

  • “हर उम्मीद उपजती भी मायूसी से है और अंत भी उसका मायूसी में ही होता है।”

 

  • “उम्मीदें दुख का इंतज़ाम हैं; दुःख से ही उठती हैं और दुःख में ही गिरती हैं।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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