उपलब्धि

  • तुम बार-बार आनंद की ही तलाश करते हो क्योंकि तुम्हारे मर्मस्थल में याद बसी है उसकी। जैसे कोई बचपन में ही घर से बिछुड़ गया हो, और उसे घर की, माँ की, धुंधली-सी स्मृति बुलाती हो। आनंद की तलाश तुम्हें इसलिए है क्योंकि आनंद तुम्हारा घर है, स्वभाव है। उसके बिना चैन कैसे पाओगे तुम? पैसा, इज्ज़त, उपलब्धियाँ – इनके साथ भी विकलता बनी ही रहेगी। “

 

  • ऊंची से ऊंची उपलब्धि मेरी यही हो सकती है कि मैं बहरा हो जाऊँ, अंधा हो जाऊँ। वो सुन सकूं जो सीधे-सीधे कहा ही जा रहा है। वो देख सकूं जो साक्षात ही है।”

 

  • पाना तो तुम सत्य को ही चाहते हो पर संसार तुम्हें गलत दिशा में मोड़ देता है। “

    ——————————————————

    उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

Leave a Reply