ईश्वर

  • सिखाने वाला एक है, माध्यम हज़ार।”

 

  • आप परम को नहीं पाते, परम आपको पा लेता है।”

 

  • मन मन को विचारे, परम को नहीं।”

 

  • “परम को तो सिर्फ़ नास्तिक ही जान सकता है, जिसने पूरी नेति-नेति कर डाली हो।”

 

  • परम लक्ष्य पहले, बाकी लक्ष्य बाद में।”

 

  • तुम उस परम विराट को अपनी जेब में रखना चाहते हो। तुम उसकी जेब में जाओ और सो जाओ। वहीँ परम विश्राम है।”

 

  • परम से परम को मांगना, सो है प्रार्थना: कि तुमसे कुछ नहीं चाहिए, बस तुम ही जाओ।”

 

  • साधु का आदर करने के लिए आपने अंदर साधुता चाहिए साधु से प्रेम आत्मा से प्रेम है , परम से प्रेम है ।”

 

  • गरीब रह पाना बहुत अमीरों का काम है। गरीब होता तो गरीब थोड़े ही होता। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होता तब तुम धन इकट्ठा करते हो। धन्य वो जो वास्तविक धन को उपलब्ध हो जाता है।”

 

  • जब तक दिल में गहरी अमीरी हो तब तक तुम ग़रीब भी नहीं हो सकते। तुम्हारे पास जब प्रभु नहीं होते तब पैसा इकट्ठा होता है ।”

 

  • हरि घरों में, मंदिरों में नहीं पाया जाता। वो अनिकेत है।”

 

  • हरि निर्विशेष है। वो विशिष्ट नहीं।”

 

  • जैसे ही कहा कि कुछ द्वार हरि के हैं, आप ये कह रहे हो कि बाकी सारे द्वार हरि के नहीं हैं। आपने हरि को भी विषय बना लिया, आपने हरि को विशिष्ट बना दिया। अब हरि से प्रेम मिलना असंभव है।”

 

  • अपने अनन्त स्वभाव से दूर जाना ही हरि से दूरी है। सीमा खींची नहीं कि हरि से दूरी हो गयी। इसीलिए हरि तक पहुँचने के लिए सीमाओं का उल्लंघन नहीं करना है, अपितु सीमाओं को मिटाना है।”

 

  • साईं से जितने दूर होंगे, उसका होना, होने जैसा होगा। जितना उसके करीब आते जाएंगे उतना साफ़ होता जाएगा, पर आप नहीं बचेंगे।”

 

  • ” पहाड़ और बादल, प्रभु की प्रभुता नहीं हैं | पहाड़ और बादल ही प्रभु हैं |”

 

  • ”काम दूर खड़ा हो, तो शैतानकाम दिल में बसा हो, तो भगवानबन्दे की पीठ पर चढ़ा हो, तो शैतान
    बन्दे के दिल में बसा हो, तो भगवान”

 

  • “वास्तविक स्वार्थ हम जानते ही नहीं। वास्तविक स्वार्थ परमार्थ होता है। वो ईश्वरीय बात है। वो परमात्मा की दी हुई चीज़ है।”

 

  • “हर आदमी सिर्फ और सिर्फ परमात्मा खोज रहा है। हर औरत, सिर्फ और सिर्फ परमात्मा खोज रही है।”

 

  • “कोई भी आदमी, जिस चीज़ की तालाश में है, वो है परमात्मा। उस चीज़ को नाम तुम कुछ भी दे सकते हो, तुम क्या नाम देते हो, वो तुम्हारी समझ पर, और तुम्हारी नासमझी पर निर्भर करता है।”

 

  • “ईश्वर परम बे पढ़ा-लिखा है, एकदम अनाड़ी है| जो एक दम अनाड़ी हो, वही ईश्वर है| ब्रह्म को कुछ नहीं आता-जाता, ब्रह्म महा अज्ञानी है – बिलकुल रॉ, अनछुआ|”

 

  • “न घर है, न बीवी है, न दौलत है, न बुद्धि है, न स्मृति है, न कान है, न आँख है – ये है परम|”

 

  • “मूढ़ में और ज्ञानी में यही अंतर है| एक सी तरंगे दोनों के कान में पड़ती हैं| एक कहता है, “यह तो चिड़िया की आवाज है”, दूसरा कहता है, “नहीं परमात्मा बोला”| एक ही दृश्य दोनों को दिखाई देता है एक कहता है, “यह देखो, यह संसार की माया है”, दूसरा कहता है, “माया सो है ठीक, पर हमें कुछ और भी दिख रहा है”|”

 

  • “तुम्हारे करे तुम्हें यह संसार ही नहीं मिला, तुम्हें परमात्मा क्या मिलेगा|”

 

  • “अपने करे संसार तो मिला नहीं, परमात्मा क्या मिलेगा|”

 

  • “जो अचिंत्य है, उसे अचिंत्य रहने दो। उसको अपनी कहानियों का हिस्सा मत बनाओ।”

 

  • “जिसने अपने विरुद्ध लड़ाई जीत ली, उसी का नाम महावीर है। दूसरों के हारने से आप वीर कहला सकते हो। महावीर वो, जिसने अपने विरुद्ध लड़ाई जीत ली, बड़ा मुश्किल है!”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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