आप्लावन

  • अहंकार एक जलन है। तपिश है। किसी में डूब जाऊं जो कुछ शीतल करे। जिस समय अहंकार को दिख जाता है कि ये सब ताल-तलैया झूठे हैं वो ख्वाब लेना बंद कर देता है। यही शीतलता है।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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