आनंद

  • आनंद सफलता की कुंजी है।”

 

  • भौतिकता क्या है? भौतिकता है यह कहना कि सबसे ऊपर मन और इन्द्रियां हैं। कि जो कुछ है, इंद्रियगत है। और यदि कुछ ऐसा है जो आँखें नहीं देख सकती, जो स्पर्श नहीं किया जा सकता, जिसे कान सुन नहीं सकते, और मन विचार नहीं कर सकता, तो वो है ही नहीं। भौतिक मन के लिए आत्मा तो नहीं ही है, साथ ही प्रेम, आनंद और मुक्ति भी नहीं हैं। यही उसकी सज़ा है।”

 

  • हम वो हैं जो मूल और फूल को एक साथ नहीं देख सकते। सत्य और संसार को अलग-अलग देखना ऐसा ही है जैसे कोई फूल और मूल को अलग-अलग समझे। जैसे कोई एक वृक्ष को अपने खंडित मन से खंड-खंड देखे। यही तो निशानी है खंडित मन की: उसे सब अलग-अलग दिखाई देता है; वो सुख में दुख, और सुख-दुख में आनंद नहीं देख पाता। फूल, शूल और मूल सब अलग-अलग हैं उसके लिए। टुकड़े देखे तो संसार, पूरा देखा तो सत्य।”

 

  • तुम बार-बार आनंद की ही तलाश करते हो क्योंकि तुम्हारे मर्मस्थल में याद बसी है उसकी। जैसे कोई बचपन में ही घर से बिछुड़ गया हो, और उसे घर की, माँ की, धुंधली-सी स्मृति बुलाती हो। आनंद की तलाश तुम्हें इसलिए है क्योंकि आनंद तुम्हारा घर है, स्वभाव है। उसके बिना चैन कैसे पाओगे तुम? पैसा, इज्ज़त, उपलब्धियाँ – इनके साथ भी विकलता बनी ही रहेगी। माँ का विकल्प खिलौने नहीं हो सकते।”

 

  • संसार से तुम्हें सुख मिल सकता है, आनंद नहीं। सुख नकली है, कल्पना है, विचार है। आनंद सत्य है, स्वभाव है।”

 

  • “आनंद क्या है? जब मन पर न सुख हावी है, न दुःख हावी है, तब मन का जो निर्बोझ होना है, जो ख़ालीपन है, उसे ‘आनंद’ कहते हैं।”

 

  • “जो दुःख में भी मस्त रखता है, उसी का नाम आनंद है।”

 

  • “आनंद हमेशा गहराई से निकलता है। गहराई में मज़ा है।”

 

  • “किसी काम से तुम्हे आनंद नहीं मिल सकता। आनदं पहले आता है, काम बाद में आता है।”

 

  • “हर दौड़ आनंद से दूर जाने की दौड़ है।”

 

  • “ख़ुशी और आनंद साथ-साथ नहीं चलते। ख़ुशी वो है जो तुम्हें चाहिए और आनंद वो है जो तुम हो। दोनों बहुत अलग बातें हैं।”

 

  • “आनंद में बहुत कुछ होता है और स्वतः होता है, बिना तुम्हारी किसी विशेष इच्छा के होता है और बहुत खुबसूरत तरीके से होता है। उसके पीछे ऊर्जा बहुत होती है, उसके पीछे बोध की गुणवत्ता होती है और वो सृजनात्मक काम होता है।”

 

  • “इतना सीधा-सादा है कि तुम कहोगे कि ये यहीं था। इसी के लिए पागल हो रहे थे, इतनी सीधी-साधी चीज़ है वो। उसमें कुछ भी चमक-धमक ‘ग्लिटर’ है ही नहीं। वो ऐसा है जैसे छोटा सा बच्चा मुस्कुरा रहा हो। कोई बनावटीपन नहीं।”

 

  • “आनंद तो निर्विशेष हो जाना है, विशेष होना नहीं।”

 

  • “आनंद बस ऐसा है शांत, सहज, साधारण।”

 

  • “आनंद ऐसा है, कि जो है, सो है उसमें कोई लीपा-पोती नहीं। उसी में खूबसूरती है।”

 

  • “सृजनात्मकता का और कोई स्रोत हो ही नहीं सकता, तुम्हारे आतंरिक आनंद के अलावा।”

 

  • जो भी उथला आदमी है वो मनोरंजन करेगा; जो गहरा आदमी है वो आनंद में रहेगा।

 

  • “आज तक गुस्सा कर के कोई खुश नहीं हुआ। नफ़रत कर के किसी को आनंद नहीं अनुभव हुआ। तुम खुद नहीं चाहते कि तुम्हें गुस्सा आए। तुम खुद नहीं चाहते तुम नफ़रत करो। ये सब चीज़े खुद अपने आप हट जाएँ क्योंकि तुम खुद इनको नहीं चाहते हो। पर तुम इन्हें पालते हो। क्यों? मन में वैहम गया है कि गुस्सा करने से मेरी अहमियत बढ़ती है। मन में एक वहम बैठ गया है कि नफ़रत करना ज़रूरी है अगर मुझे अपना प्यार सिद्ध करना है। तुम जानते हो हम नफ़रत अक्सर क्यों करते हैं? क्योंकि हम किसी को अपना प्यार सिद्ध कर रहे होते हैं।”

 

  • “भय का अभाव आनंद है।”

 

  • “सतही मन के लिए रस बस प्रसन्नता की उत्तेजना है, आत्मा से संयुक्त मन के लिए रस का अर्थ आनंद है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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