आदत

  • अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं।”

 

  • तुम अब गधे रहे नहीं पर करते तुम ढेंचू-ढेंचू ही हो। आदत है, व्यर्थ आदत है।”

 

  • हम उन्हें भ्रांत कहते हैं जो हमारे बनाए हुए ढर्रों पर नहीं चलते।”

 

  • “शक़ करना तुम्हारी आदत बन चुकी है। यकीन तुम्हें आता ही नहीं क्योंकि यक़ीन का श्रद्धा से बहुत गहरा सम्बन्ध है।”

 

  • ढर्रों पर चलना विक्षिप्तता है। पर विक्षिप्तता इस हद तक भी जा सकती है कि आप आदतें और ढर्रे भी बना पाएं ।”

 

  • “अपनी मोटी-मोटी, सबसे बड़ी-बड़ी, आदतों को पहचान लो और निर्मम होके उन्हें तोड़ डालो। यही मोक्ष है, इसके आलावा और कुछ नहीं।”

 

  • “आदत से लड़ो नहीं, ‘ना लड़ना ही जीत है’।”

 

  • “अटेंशन तो आदत को नष्ट कर देता है, अटेंशन की आदत नहीं डाली जाती, होश की कोई आदत नहीं होती।”

 

  • “अपनी आदतों के सिवा मैं कुछ और नहीं।”

 

  • “आदत का अर्थ है: सोए रहना, होश का अर्थ है जगना।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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