आकाश

  • संसार का अर्थ ही है खुले आकाश में लकीर खींचना। जो जितनी लकीरें खींचता है, वो संसार को उतनी ही मान्यता देता है।”

 

  • तुम राजपथ पर ही चलते रह गए, मुक्त आकाश में उड़े ही नहीं।”

 

  • छूटता किसी तर्क के कारण नहीं है, बल्कि तब है जब पकड़ना भूल जाते हो। जब होने का आकाश छप्पर फाड़ के बरसता है तब हक्के-बक्के रह जाते हो। पकड़ना-छोड़ना सब छूट जाता है।”

 

  • बाहर से देखो तो तिनका, उसका दिल खोलो तो आकाश।”

 

  • तलाश सबको एक ही है। पर तलाशी के तलों में आकाश-पाताल का अंतर है।”

 

  • “ज़मीन पर दौड़कर, आसमान में उड़ जाता है।”

 

  • “जिसने ज़मीन का इस्तेमाल करना सीख लिया, जिसने ज़मीन को सम्मान देना सीख लिया, जो ज़मीन के प्रति शिकायत से अब नहीं भरा हुआ है, वो अपनेआप ही आसमान को पहुँच जायेगा।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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