अविद्या

  • पापी को लक्ष्य करो, पाप को नहीं। बेहोशी में किया कर्म ही पाप है, और बेहोश मन ही पापी। जब तक बेहोश मन रहेगा, तब तक बेहोशी के पाप रहेंगे ही।”

 

  • जीवन ऐसा हो कि विद्या और अविद्या दोनों साथ चलें, शोर और मौन एक साथ रहें। दोनों तलों को साधना है, और प्रतिपल, और एक साथ।”

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    उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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