अनुभव

  • मन की वृद्धि ही मन की अशुद्धि।”

 

  • जो वास्तविक है, उसका कोई अनुभव नहीं हो सकता।”

 

  • सुख-दुःख समान हैं, इसका अर्थ यह नहीं है क़ि दोनों को अनुभव ही करो- ऐसा तो मुर्दा करता है। इसका अर्थ है यह जानना कि दोनों का मूल एक ही है। सुख में डूब कर सुखी हो और दुःख में डूब कर दुखी हो। सुख-दुःख का विरोध, अहंकार है। संत सुख और दुःख दोनों को गहराई से अनुभव करता है। तुमने जिसको गहराई से अनुभव कर लिया, तुम उससे अस्पर्शित हो जाओगे।”

 

  • योगी ही पूरे तरीके से अनुभव कर पाता है क्योंकि उसकी इन्द्रियाँ स्वस्थ होती हैं, पूरा-पूरा काम करती हैं।”

 

  • ऐसी इन्द्रियाँ जो संसार को पूरा-पूरा अनुभव कर पाती हैं, स्वस्थ इन्द्रियाँ कहलाती हैं। ऐसी आँखें निराकार को देखती हैं, ऐसे कान अनहद को सुनते हैं।”

 

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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