अनुकूलन

  • संसार का विरोध इसलिये क्योंकि संसार की प्रकृति है प्रभावित करना, संस्कारित करना। जो संसार के आकर्षण से खिंचे और उसके डराने से डरे, वो संसार का विरोध ही कर रहा है। उस विरोध के लिए गहरा समर्पण चाहिए। तो संसार का विरोध करो ताकि तुम संसार में प्रेम से रह सको। जितना गहरा प्रेम, उतना गहरा विरोध। ”
  • अलग-अलग संस्कार ही अलग-अलग व्यक्ति बनते हैं। “

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उपरोक्त सूक्तियाँ श्री प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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