अकेलापन

  • अहम् अकेला नहीं रह सकता। उसे सदा किसी विषय की तलाश रहती है; विषय ही अहम् को अर्थ और जीवन देता है। विषय के साथ जुड़ना बंधन है, पर विषयातीत के साथ भी जुड़ा जा सकता है। परम मुक्ति है, जब अहम् विषयातीत के साथ जुड़ जाता है। मुक्त के साथ जुड़ते ही अहंकार नहीं बचता है। जो बंधन के साथ खुद को जोड़ने से मना कर दे, वो खुद ही मुक्त के साथ जुड़ जायेगा। मना करने की असीम ताकत, आख़िरी बात, तुम्हारे ही हाथ में दे दी गई है। बस मना कर दो।”

 

  • दूसरों के होते हुए भी क्या आपको अकेला रहना आता है? जहाँ ‘दूसरा’ है, वही आपकी अपूर्णता की निशानी है।”

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उपरोक्त सूक्तियाँ आचार्य प्रशांत के लेखों और वार्ताओं से उद्धृत हैं

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